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भारत का संविधान राज्यों को निर्देशित एवं नियंत्रित करने वाला सर्वोच्च कानून प्रदाता है। यह देश के गतिशील सामाजिक-राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिदृश्य को दर्शाता है। कई संवैधानिक संशोधनों ने इसकी अनुकूलनशीलता सुनिश्चित की है, जिससे यह अपने मूल सिद्धांतों को संरक्षित करते हुए समाज की उभरती जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है।
| कंटेंट टेबल |
| भारतीय संविधान के विकास का इतिहास क्या है? संविधान में संशोधन करने में संसद की शक्ति क्या है? भारत में ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन क्या हैं? भारत में संवैधानिक संशोधनों की क्या आवश्यकता है? संवैधानिक संशोधनों की आलोचना क्या है? निष्कर्ष |
भारतीय संविधान के विकास का इतिहास क्या रहा है?
भारतीय संविधान की नींव ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान रखी गई थी। भारतीय संविधान का विकास महत्वपूर्ण विधायी विकास द्वारा चिह्नित किया गया है।
| भारत सरकार अधिनियम 1858 | इसने ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को समाप्त किया तथा भारत में प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन की स्थापना की। |
| भारतीय परिषद अधिनियम 1861 और 1892 | इसने नियुक्त परिषदों के माध्यम से विधायी प्रक्रियाओं में भारतीयों को शामिल करके सीमित प्रतिनिधि शासन की शुरुआत की। |
| भारत सरकार अधिनियम 1909 (मोर्ले-मिंटो सुधार) | इसने विधान परिषदों का विस्तार किया और मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन कि व्यवस्था पेश की, जिससे सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की शुरुआत हुई। |
| भारत सरकार अधिनियम 1919 (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) | इसने द्वैध शासन की स्थापना की, प्रांतीय और केंद्रीय कार्यों को अलग किया तथा सीमित स्वशासन की अनुमति दी। |
| भारत सरकार अधिनियम 1935 | इस अधिनियम ने संघीय ढांचे, द्विसदनीय विधायिका और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटों का निर्माण किया, जो भारतीय संविधान का अग्रदूत था। |
संविधान संशोधन में संसद की क्या शक्ति है? भारत में ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन कौन से हैं?
अनुच्छेद 368 संसद को संविधान संशोधन का अधिकार देता है, लेकिन संघवाद और मौलिक अधिकारों जैसे मूलभूत पहलुओं को बाहर रखता है। हालाँकि केशवानंद भारती केस (1973) ने मूल संरचना के सिद्धांत को पेश किया, जिसने संसद की लोकतंत्र, कानून के शासन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मूल सिद्धांतों को बदलने की क्षमता को सीमित कर दिया।
ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन
| पहला संविधान संशोधन (1951) | इसने अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाकर और अस्पृश्यता को दूर करके व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित किया। |
| 7वां संविधान संशोधन (1956) | इसने भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया और संघ सूची को अद्यतन किया। |
| 42वां संविधान संशोधन (1976) | इसे “मिनी-संविधान” के नाम से भी जाना जाता है, इसने सत्ता को केंद्रीकृत किया और प्रस्तावना में “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द जोड़ दिए। |
| 40वां संविधान संशोधन (1978) | इसने अलोकतांत्रिक आपातकालीन समय किया गया संशोधन को बदल दिया गया तथा मौलिक अधिकारों की संरक्षण हेतु संशोधन किया गया। |
| 52वां संविधान संशोधन (1985) | इसने राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए दलबदल विरोधी कानून लागू किया। |
| 61वां संविधान संशोधन (1988) | इसने मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी, जिससे युवाओं की भागीदारी बढ़ गयी। |
| 73वां और 74वां संविधान संशोधन (1992) | इसने हाशिए पर पड़े समूहों के लिए आरक्षित सीटों के साथ पंचायतों और नगर पालिकाओं का निर्माण करके स्थानीय शासन को मजबूत किया। |
| 99वां संविधान संशोधन (2014) | न्यायिक नियुक्तियों के लिए NJAC का प्रस्ताव रखा गया लेकिन न्यायिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करने के कारण इसे खारिज कर दिया गया। |
| 101वां संशोधन (2016) | भारत के कर ढांचे को एकीकृत करते हुए वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया गया। |
भारत में संविधान संशोधन की क्या आवश्यकता है?
- संघीय संतुलन बनाए रखना- भारतीय संविधान ने अपने संघीय ढांचे और मजबूत एकात्मक के साथ, संघ और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से उसमे लचीलापन शामिल किया है।
- सामाजिक और आर्थिक बदलावों को संबोधित करना- संशोधन यह सुनिश्चित करते हैं कि संविधान समकालीन समाज की सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रासंगिक और प्रभावी बना रहे। उदाहरण के लिए- 73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) ने पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों के माध्यम से स्थानीय स्वशासन को सशक्त बनाया, जिससे जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को बढ़ावा मिला।
- मौलिक अधिकारों का संरक्षण- संवैधानिक संशोधन मौलिक अधिकारों को विस्तारित या स्पष्ट करने में मदद करते हैं ताकि वे उभरते सामाजिक मूल्यों को प्रतिबिंबित कर सकें। 86वें संशोधन (2002) ने अनुच्छेद 21A के तहत 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल किया गया।
- अस्पष्टताओं और विवादों का समाधान- कुछ संवैधानिक प्रावधानों को कार्यान्वयन के दौरान उत्पन्न होने वाली कानूनी अस्पष्टताओं या विवादों को दूर करने के लिए संशोधन की आवश्यकता होती है। 42वें संशोधन (1976) को “मिनी संविधान” के रूप में भी जाना जाता है, इसने केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों को स्पष्ट किया, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का विस्तार किया और मौलिक कर्तव्यों को भाग IV A के रूप में शामिल किया।
- शासन और लोकतंत्र को मजबूत बनाना- संवैधानिक संशोधन संस्थाओं और प्रक्रियाओं की दक्षता और जवाबदेही में सुधार करते हैं। 61वें संशोधन 1989 ने मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी, जिससे अंततः लोकतंत्र में युवाओं की भागीदारी बढ़ गई।
- सामाजिक न्याय और समानता सुनिश्चित करना- संवैधानिक संशोधनों का उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना और हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए समावेशी विकास सुनिश्चित करना है। 93वें संशोधन 2005 ने निजी गैर-सहायता प्राप्त संस्थानों सहित शैक्षणिक संस्थानों में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को सक्षम किया।
- न्यायिक व्याख्या का जवाब देना- संवैधानिक प्रावधानों की न्यायिक व्याख्याओं को रद्द करने या स्पष्ट करने के लिए कुछ संशोधन आवश्यक हैं। 24वें संशोधन 1971 ने मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग को संशोधित करने की संसद की शक्ति की पुष्टि की।
संवैधानिक संशोधनों की आलोचनाएँ क्या हैं?
- संविधान की स्थिरता को कमज़ोर करना- 42वें संशोधन 1976 की आलोचना संविधान के मूल ढांचे को बदलने के लिए की गई थी। इसने सत्तारूढ़ दल के अतिक्रमण और संविधान की स्थिरता को कमज़ोर करने की चिंताएँ पैदा कीं।
- राजनीतिक प्रेरणाएँ- कई संवैधानिक संशोधनों का पक्षपातपूर्ण लाभ के लिए दुरुपयोग किया गया है। 39वाँ संशोधन 1975, जिसने प्रधानमंत्री के चुनाव को न्यायिक समीक्षा से परे रखा, को व्यापक रूप से आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार को बचाने के साधन के रूप में देखा गया।
- संघवाद का कमजोर होना- कुछ संशोधनों की आलोचना सत्ता को केंद्रीकृत करने के लिए की गई है, जिसने देश के संघीय ढांचे को कमजोर कर दिया है। 42वें संशोधन 1976 ने राज्य की स्वायत्तता की कीमत पर केंद्र की शक्तियों को बढ़ा दिया।
- व्यापक परामर्श का अभाव – कुछ संवैधानिक संशोधनों की आलोचना इस बात के लिए की गई है कि इन्हें जनता या हितधारकों से पर्याप्त परामर्श के बिना संसद में जल्दबाजी में पारित कर दिया गया।
- अति प्रयोग या दुरुपयोग का जोखिम- यह चिंता का विषय है कि संशोधन की संसद में संशोधनों को जल्दबाजी में पारित करने की प्रचलन प्रारंभ कर दिया है, जिससे संविधान की लचीलापन कम हो गया है। भारत ने 1950 से अब तक 100 से अधिक संशोधन किए गए हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका ने 230 से अधिक वर्षों में केवल 27 संशोधन देखे हैं।
निष्कर्ष
भारतीय संविधान एक गतिशील दस्तावेज है जो अपने आधारभूत सिद्धांतों की रक्षा करते हुए समकालीन चुनौतियों का समाधान करने के लिए विकसित होता है। संसद और न्यायिक निगरानी द्वारा निर्देशित संवैधानिक संशोधनों ने भारत के लोकतांत्रिक और संघीय ढांचे को आकार दिया है। प्रत्येक संशोधन न्याय, समानता और शासन के प्रति राष्ट्र की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
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