रूस-यूक्रेन संकट में भारत की भूमिका : महत्व और चुनौतियाँ – बिंदुवार व्याख्या

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल ही में यूक्रेन की ऐतिहासिक यात्रा के दौरान, भारत ने सभी हितधारकों के बीच वास्तविक और व्यावहारिक जुड़ाव की आवश्यकता को दोहराया, ताकि ऐसे अभिनव समाधान विकसित किए जा सकें जिनकी व्यापक स्वीकार्यता हो और जो शीघ्र शांति बहाली में योगदान दें। शांति की शीघ्र वापसी को सुविधाजनक बनाने के लिए सभी संभव तरीकों से भारत का योगदान रूस-यूक्रेन संकट में शांति की खोज में शामिल होने की इच्छा का एक स्पष्ट संकेत है।

लेख में रूस-यूक्रेन संकट पर भारत की विदेश नीति के रुख, शांति प्रक्रिया के महत्व और रूस-यूक्रेन संकट में शांति बहाल करने की चुनौतियों पर चर्चा की गई है।

Russia-Ukraine Crisis
Source- The Indian Express
कंटेंट टेबल
रूस-यूक्रेन संकट पर भारत की विदेश नीति का पहल क्या रहा है?

प्रधानमंत्री की हाल की यूक्रेन यात्रा और भारत की मध्यस्थता की मंशा का क्या महत्व है?

रूस-यूक्रेन संकट में शांति के क्या महत्त्व होंगे?

शांति प्रक्रिया में मध्यस्थ के रूप में भारत को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा?

आगे की राह क्या होनी चाहिए?

रूस-यूक्रेन संकट पर भारत की विदेश नीति का क्या पहल रहा है?

  1. गुटनिरपेक्षता और सामरिक स्वायत्तता (Non-alignment and strategic autonomy) – भारत की विदेश नीति का रुख गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता के ऐतिहासिक सिद्धांतों से प्रेरित है। भारत ने वैश्विक शक्तियों के साथ अपने संबंधों और क्षेत्रीय विवादों की शांतिपूर्ण वार्ता को संतुलित करने की मांग की है।
  2. निष्पक्षता और तटस्थता (Neutrality and Abstention) – फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से ही भारत निष्पक्ष रहा है। पश्चिमी देशों की नाराजगी के बावजूद, जो चाहते हैं कि भारत संघर्ष में रूसी भूमिका की निंदा करे, भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में प्रस्तावों पर रोक लगा दी है।
  3. आर्थिक और सामरिक हित (Economic and Strategic Interests) – भारत ने बढ़ती वैश्विक कीमतों के बीच अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रियायती दरों पर रूसी तेल का आयात जारी रखा है। हालांकि, साथ ही, भारत ने रक्षा उपकरणों की खरीद में विविधता लाने की आवश्यकता को पहचानते हुए रूसी सैन्य आपूर्ति पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश की है।
  4. संस्थागत तंत्र के माध्यम से निपटान (Settlement through institutional mechanisms) – भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रति सम्मान और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं के माध्यम से विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की वकालत की है। भारत की विदेश नीति का यह दृष्टिकोण भारत की राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्यों के प्रबंधन की व्यापक रणनीति के अनुरूप था।

मध्यस्थता प्रक्रिया में अधिक सक्रिय भूमिका की बढ़ी उम्मीदें

a) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया कूटनीतिक गतिविधियों, जिसमें यूक्रेन और रूस की उनकी यात्रा, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत और सितंबर में संयुक्त राष्ट्र की बैठक और रूस में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में आगामी पहल ने उम्मीदें बढ़ा दी हैं कि भारत रूस-यूक्रेन संघर्ष में मध्यस्थता में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकता है।

b) रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेनी राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की दोनों के साथ वार्ता में, भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अहिंसा की आवश्यकता पर जोर दिया है। यह कूटनीतिक जुड़ाव मध्यस्थ के रूप में कार्य करने के भारत के इरादे को उजागर करता है, ।

प्रधानमंत्री की हाल की यूक्रेन यात्रा और भारत की मध्यस्थता की मंशा का क्या महत्व है?

  1. बैलेंसिग एक्ट (Balancing act) – विश्लेषकों द्वारा भारतीय प्रधान मंत्री की हालिया यात्रा को भारत द्वारा संतुलनकारी कार्य के रूप में देखा जाता है, विशेष रूप से प्रधान मंत्री की हालिया रूस यात्रा के बाद, जिसने पश्चिमी शक्तियों की आलोचना को आकर्षित किया।
  2. एक तटस्थ देश के रूप में स्थिति (Positioning as a neutral player) – रूस और यूक्रेन दोनों के साथ जुड़कर, भारत रूस-युक्रेन युद्ध में खुद को एक तटस्थ के रूप में स्थापित कर सकता है। इससे शांति और स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध एक जिम्मेदार वैश्विक अभिनेता के रूप में इसकी छवि मजबूत होगी।
  3. मध्यस्थ के रूप में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की व्यापक रणनीति (Broader strategy to play a more active role as a mediator) – यह संतुलन दृष्टिकोण कोरियाई युद्ध युद्धविराम वार्ता और कोलंबो योजना में अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में मध्यस्थ के रूप में भारत की ऐतिहासिक भूमिका के साथ संरेखित है। भारत एक ऐसे देश के रूप में अपनी अनूठी स्थिति का लाभ उठाना चाहता है जो अधिक सक्रिय मध्यस्थता भूमिका निभाने के लिए मास्को और वाशिंगटन दोनों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखता है।
  4. ग्लोबल साउथ के नेतृत्व को मजबूत करना (Reinforcing the leadership of the Global south) – मध्यस्थता में भारत का प्रस्ताव, बातचीत में ग्लोबल साउथ देशों के पहले से चल रहे प्रयास को महत्व देता है। भारत का दबाव वैश्विक दक्षिण में उसकी प्रमुखता को मजबूत करता है।

रूस-यूक्रेन संघर्ष में शांति के क्या फायदे होंगे?

शत्रुता की अस्थायी समाप्ति या भारत जैसे निष्पक्ष देश द्वारा किया गया सीमित शांति समझौता इसमें शामिल सभी पक्षों के हितों की पूर्ति कर सकता है।

  1. संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) – संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए, रूस-यूक्रेन संकट में शांति उसे पश्चिम एशियाई भू-राजनीतिक चुनौतियों जैसी अन्य महत्वपूर्ण विदेश नीति चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर प्रदान करती है।
  2. यूरोपीय देश (European countries) – शांति से आर्थिक पुनर्निर्माण और ऊर्जा असुरक्षा को दूर करने में मदद मिलेगी। रूस-यूक्रेन संकट में शांति से ऊर्जा की कमी और मुद्रास्फीति के दबाव की चुनौतियों को कम किया जा सकेगा और यूरोपीय नीति निर्माताओं को राहत मिलेगी।
  3. रूस (Russia)– रूस के लिए, भारत जैसे निष्पक्ष के माध्यम से वार्ता में शामिल होना पश्चिमी दबाव के सामने आत्मसमर्पण किए बिना संघर्ष/युद्ध से सम्मानजनक निकास की पेशकश कर सकता है।
  4. भारत (India)– संघर्ष के समाधान में मध्यस्थ के रूप में भारत की सफलता “विश्वामित्र” के रूप में भारत के उनके व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप होगी, एक ऐसा देश जो वैश्विक आर्थिक और तकनीकी प्रगति में योगदान देता है और अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।

शांति प्रक्रिया में मध्यस्थ के रूप में भारत को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा?

  1. दोनों पक्षों की अधिकतमवादी स्थिति (Maximalist position from both the sides)- दोनों पक्षों की ओर से अधिकतमवादी रुख- रूस और यूक्रेन दोनों ही सैन्य लाभ पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जैसा कि पीएम मोदी की मॉस्को यात्रा से पहले यूक्रेन पर रूस के हमलों और उनकी कीव यात्रा से पहले कुर्स्क ओब्लास्ट में यूक्रेन के अभियानों से देखा जा सकता है। दोनों पक्षों द्वारा अपने रुख से पीछे हटने से इनकार करना शांति प्रक्रिया में एक बड़ी चुनौती है।
  2. प्रतिस्पर्धी मांगें (Competing Demands)- दोनों पक्षों के दृढ़ रुख के कारण स्थिति जटिल हो गई है: राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की यूक्रेन से रूस की पूरी तरह वापसी की मांग कर रहे हैं, जबकि राष्ट्रपति पुतिन चाहते हैं कि यूक्रेन अपने कब्जे वाले क्षेत्रों से वापस लौट जाए और नाटो की सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी छोड़ दे।
  3. कई देशों के परस्पर विरोधी हित (Conflicting interests of multiple actors) – इस युद्ध में विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय अभिनेताओं की भागीदारी, रूस-यूक्रेन संकट में शांति के लिए किसी भी बातचीत की प्रक्रिया को अत्यधिक जटिल बनाती है।
  4. गहराई से जुड़े हित (Deeply entrenched interests) – अमेरिका और रूस के भू-राजनीतिक हित गहराई से जुड़े हुए हैं, और दोनों शक्तियों के एक-दूसरे द्वारा प्रस्तावित शांति समझौते पर सहमत होने की संभावना नहीं है।

आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?

  1. यथार्थवादी मूल्यांकन (Realistic assessment)– भारतीय विदेश नीति प्रतिष्ठान को यथार्थवादी मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि क्या यूक्रेन और उसके पश्चिमी साथी चाहते हैं कि भारत शांति प्रक्रिया में मध्यस्थ के रूप में सक्रिय रूप से शामिल हो।
  2. प्रभावी संघर्ष मध्यस्थता (Effective Conflict Mediation)– भारत को युद्धविराम और स्थायी शांति के लिए अपने स्वयं के सिद्धांतों को परिभाषित करने की आवश्यकता है। भारत को ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव और हालिया कैदीयों की आदान-प्रदान जैसी प्रभावी मध्यस्थताओं से सीख लेनी चाहिए।
  3. ऐतिहासिक मध्यस्थता की सफलताओं से सीख (Learning from Historical Mediation Successes) – भारत को 1950 में ऑस्ट्रिया-सोवियत संकट, कोरियाई युद्ध युद्धविराम वार्ता और कोलंबो योजना में मध्यस्थ के रूप में अपने सफल हस्तक्षेपों से भी सीख लेनी चाहिए।
  4. पक्षपात की धारणाओं पर काबू पाना (Overcoming Perceptions of Partiality)– संघर्ष की प्रभावी मध्यस्थता के लिए, भारत को मॉस्को के प्रति पक्षपात की धारणाओं पर काबू पाना चाहिए।
Read More- The Hindu
UPSC Syllabus- GS 2- International Relations

 

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