सम्मान के साथ मृत्यु का अधिकार- बिन्दुवार व्याख्या

sfg-2026
ForumIAS LATEST
      1. SFG FRC 2027 | Program starts from 19th Dec. 2026 | Admissions open for Entrance Test Click Here to know more →
      2. Prelims Test Series (PTS) for Prelims 2027 starts 11th Oct. 2026 Click Here to know more →
      3. [Pre-order] Ethics Redbook 3rd Edition: Delivery starts from 10th October onwards Click Here to Read More →
      4. 21 Sept. | GS Advance Program (GSAP) for UPSC 2027 Mains starts from 11th Oct. Click Here to Read More →

हाल ही में, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने मरणासन्न रोगियों में जीवन रक्षक उपचार वापस लेने के लिए मसौदा दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य सभी भारतीयों के लिए सम्मान के साथ मरने के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के 2018 और 2023 के आदेशों को लागू करना है। ये मसौदा दिशानिर्देश और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भारत में जीवन रक्षक उपचार को रोकने/वापस लेने के लिए एक स्पष्ट कानूनी परिभाषित रूपरेखा प्रदान करते हैं।

Right to Die
Source- The Indian Express

कंटेंट टेबल

 

जीवन रक्षक उपचार को रोकने/वापस लेने का क्या मतलब है? भारत में इसका पालन कैसे किया जाता है?

भारत में मृत्यु के अधिकार के विकास का इतिहास क्या रहा है?

जीवन रक्षक उपचार वापस लेने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के नवीनतम दिशा-निर्देश क्या हैं?

जीवन रक्षक उपचार वापस लेने के दिशा-निर्देशों का क्या महत्व है?

जीवन रक्षक उपचार वापस लेने के लिए नए दिशा-निर्देशों में क्या चुनौतियाँ हैं, जो मृत्यु के अधिकार को मजबूत करते हैं?

आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?

जीवन रक्षक उपचार को रोकने/वापस लेने का क्या मतलब है? भारत में इसका पालन कैसे किया जाता है?

जीवन-रक्षक उपचार को रोकना या वापस लेना – इसका तात्पर्य जीवन-रक्षक चिकित्सा हस्तक्षेप जैसे वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब आदि को बंद करना है, जब ये रोगी की स्थिति में सुधार नहीं करते हैं या उनकी पीड़ा को बढ़ाते हैं।

जीवन रक्षक उपचार रोकने की प्रक्रिया- जीवन रक्षक उपचार को रोकना या वापस लेना या तो हो सकता है:
a. सूचित इनकार- निर्णय लेने की क्षमता वाले रोगी द्वारा सूचित इनकार
b. अग्रिम चिकित्सा निर्देश या ‘लिविंग विल’- यह एक दस्तावेज है जो निर्दिष्ट करता है कि यदि व्यक्ति भविष्य में अपने स्वयं के चिकित्सा निर्णय लेने में असमर्थ हो तो क्या कार्रवाई की जानी चाहिए।
c. लिविंग विल की अनुपस्थिति के मामले में उपचार करने वाले चिकित्सक द्वारा निर्धारण- निम्नलिखित मामलों में, लिविंग विल की अनुपस्थिति में उपचार करने वाला चिकित्सक जीवन समर्थन वापस लेने का निर्धारण कर सकता है-
टर्मिनल या अंतिम चरण की स्थिति, या वनस्पति अवस्था से ठीक होने की कोई उचित चिकित्सा संभावना नहीं है। कोई भी अतिरिक्त चिकित्सा हस्तक्षेप या उपचार का तरीका केवल कृत्रिम रूप से मरने की प्रक्रिया को लम्बा खींच देगा।

जीवन-रक्षक उपचार को रोकना/वापस लेना उपशामक देखभाल है, परित्याग नहीं

a. जीवन-रक्षक उपचार को रोकना या वापस लेना देखभाल को वापस लेना नहीं है, बल्कि उपशामक सहायता की ओर बदलाव है, जिसका उद्देश्य दर्द को कम करना और आराम को बढ़ाना है।

भारत में मृत्यु के अधिकार के विकास का इतिहास क्या रहा है?

चिकित्सा उपचार से इनकार करने का अधिकार हमेशा से आम कानून में मौजूद रहा है, भले ही इससे मृत्यु ही क्यों न हो। कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, चिकित्सा उपचार से इनकार करने के अधिकार को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में भी मान्यता दी गई है।

अरुणा शॉनबाग बनाम भारत संघ, 2011सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि जीवन रक्षक उपचार को कानूनी तौर पर निर्णय लेने की क्षमता से रहित व्यक्तियों से भी रोका/वापस लिया जा सकता है।
कॉमन कॉज बनाम भारत संघ, 2018सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के साथ मरने के अधिकार को मौलिक अधिकार माना तथा अग्रिम चिकित्सा निर्देश या ‘लिविंग विल‘ के उपयोग को वैधानिक बना दिया।
कॉमन कॉज बनाम भारत संघ, 2023सर्वोच्च न्यायालय ने नौकरशाही संबंधी बाधाओं को दूर करके लिविंग विल बनाने और जीवन-रक्षक उपचार को रोकने/वापस लेने की प्रक्रिया को सरल बना दिया।

जीवन रक्षक प्रणाली हटाने के संबंध में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के नवीनतम दिशानिर्देश क्या हैं?

चिकित्सा बोर्डों की स्थापना और उनकी सिफारिशें1. अस्पतालों को यह मूल्यांकन करने के लिए प्राथमिक और द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड स्थापित करने होंगे कि क्या किसी असाध्य रोगी के लिए निरंतर उपचार लाभदायक है।
2. प्राथमिक बोर्ड- इसमें उपचार करने वाले डॉक्टर और कम से कम पांच साल के अनुभव वाले दो विषय-वस्तु विशेषज्ञ शामिल होंगे। यह रोगी की स्थिति का आकलन करेगा और जीवन रक्षक उपचार को रोकने/वापस लेने की उपयुक्तता की सिफारिश करेगा।
3. द्वितीयक बोर्ड- इसमें जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा नामित एक पंजीकृत चिकित्सक और कम से कम पांच साल के अनुभव वाले दो विषय-वस्तु विशेषज्ञ शामिल होंगे। ये सभी सदस्य प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड के सदस्यों से अलग होने चाहिए। यह प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड के निर्णय की समीक्षा करेगा।
नामित व्यक्तियों की सहमतिअग्रिम चिकित्सा निर्देश में रोगी द्वारा नामित व्यक्ति या प्रतिनिधि निर्णयकर्ता (जहां कोई निर्देश न हो) को उपचार रोकने या वापस लेने के लिए सहमति देनी होगी।
न्यायिक मजिस्ट्रेट को निर्णय की अधिसूचनाअस्पताल को जीवन रक्षक उपचार रोकने/वापस लेने के निर्णय की सूचना स्थानीय न्यायिक मजिस्ट्रेट को देनी होगी।

जीवन रक्षक प्रणाली हटाने के दिशानिर्देशों का क्या महत्व है?

  1. सम्मान के साथ मरने के अधिकार की पुष्टि – हालिया मसौदा दिशानिर्देश कॉमन कॉज ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2018 और 2023 के फैसलों को लागू करते हैं, जिससे गंभीर रूप से बीमार मरीजों के सम्मान के साथ मरने के कानूनी अधिकार को मजबूती मिलती है।
  2. निर्णय लेने के लिए संरचित तंत्र – दिशा-निर्देशों में अस्पतालों में प्राथमिक और द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड बनाने का आह्वान किया गया है। निगरानी के ये स्तर यह सुनिश्चित करते हैं कि जीवन रक्षक प्रणाली हटाने के निर्णय की पूरी तरह से जांच की गई है।
  3. जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की प्रक्रिया- दिशा-निर्देशों में एक स्पष्ट प्रक्रिया बताई गई है- प्राथमिक बोर्ड रोगी की स्थिति का आकलन करता है, और द्वितीयक बोर्ड स्वतंत्र रूप से इसकी समीक्षा करता है। रोगी द्वारा नियुक्त सरोगेट्स या परिवार के सदस्यों की सहमति आवश्यक है, और अस्पताल को निर्णय के बारे में न्यायिक मजिस्ट्रेट को सूचित करना चाहिए। यह प्रक्रिया जाँच, पारदर्शिता और जवाबदेही प्रदान करती है।
  4. नैतिक साझा निर्णय लेना- दिशा-निर्देश डॉक्टरों और मरीज के परिवार के बीच साझा निर्णय लेने पर जोर देते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि चिकित्सा देखभाल मरीज की इच्छाओं के अनुरूप हो और कानूनी स्पष्टता प्रदान करे। यह दृष्टिकोण मरीज की स्वायत्तता का सम्मान करता है, चिकित्सा पेशेवरों की रक्षा करता है और परिवार के बोझ को कम करता है।

जीवन रक्षक प्रणाली वापस लेने के नए दिशा-निर्देशों में क्या चुनौतियां हैं, जो मरने के अधिकार को मजबूत करते हैं?

  1. मेडिकल बोर्ड की स्थापना में जटिलता – प्रत्येक अस्पताल के लिए प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड की स्थापना संसाधन-गहन हो सकती है, विशेष रूप से छोटे अस्पताल सुविधाओं के लिए।
  2. समर्पित कानून का अभाव – मरने के अधिकार के मुद्दे पर एक विशिष्ट कानून की अनुपस्थिति असंगत आवेदन और कानूनी अनिश्चितता को जन्म दे सकती है। यह अस्पतालों को दिशा-निर्देशों को पूरी तरह से लागू करने से हतोत्साहित कर सकता है।
  3. उपचार वापसी की गलतफहमी- “निष्क्रिय इच्छामृत्यु” शब्द का इस्तेमाल अभी भी आम तौर पर किया जाता है, जिससे सम्मान के साथ मरने के अधिकार को लेकर भ्रम और सामाजिक असुविधा होती है। यह सांस्कृतिक और शब्दावली संबंधी बाधा जीवन-समर्थन वापसी की स्वीकृति में बाधा डाल सकती है।
  4. लिविंग विल बनाने की चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया- लिविंग विल बनाना एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें गवाहों, निष्पादकों और नोटरी द्वारा दस्तावेजीकरण और सत्यापन शामिल है।
  5. निर्णय लेने में देरी की संभावना- मेडिकल बोर्ड, परिवार या सरोगेट की सहमति और न्यायिक अधिसूचना दोनों को शामिल करने वाली बहु-चरणीय प्रक्रिया जीवन-सहायक प्रक्रिया को वापस लेने में देरी कर सकती है। यह सम्मान के साथ मरने के अधिकार पर आघात करता है।
  6. परिवारों और चिकित्सकों पर भावनात्मक और नैतिक दबाव – साझा निर्णय लेने की आवश्यकता, जिसका उद्देश्य रोगियों के अधिकारों की रक्षा करना है, परिवारों और चिकित्सकों पर भावनात्मक और नैतिक दबाव डालती है।

आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?

  1. विधायी स्पष्टता और समर्थन- विधिनिर्माताओं को ऐसे कानून बनाने पर विचार करना चाहिए जो टर्मिनल मामलों में जीवन-सहायता वापसी को परिभाषित और नियंत्रित करता हो। इससे सम्मान के साथ मरने के अधिकार की पुष्टि होगी।
  2. चिकित्सा पेशेवरों को शिक्षित और प्रशिक्षित करना- चिकित्सा पेशेवरों को जीवन-रक्षक उपचार वापस लेने के नैतिक, कानूनी और प्रक्रियात्मक पहलुओं पर मजबूत प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
  3. लिविंग विल प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना- लिविंग विल बनाने और उसे मान्य करने की प्रक्रिया को सरल बनाया जाना चाहिए, तथा विविध पृष्ठभूमि के लोगों के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए।
  4. सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाना- जागरूकता बढ़ने से परिवार अपने प्रियजनों की इच्छाओं के अनुरूप निर्णय लेने में सक्षम होंगे तथा अनावश्यक कष्टों को कम कर सकेंगे।
Read More- The Indian Express
UPSC Syllabus- GS 2- Indian Constitution

 

Print Friendly and PDF
Blog
Academy
Community