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कुछ रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय श्रमिकों की क्षमताओं और उनकी अपेक्षाओं के बीच स्पष्ट कौशल बेमेल के कारण भारत और इज़राइल के बीच सहमत निर्माण श्रम व्यवस्था तनाव में है। जबकि कुछ श्रमिक अब भारत लौट आए हैं, अन्य को भारत और इज़राइल के बीच मजबूत संबंधों को ध्यान में रखते हुए अन्य क्षेत्रों में फिर से नियुक्त किया गया है।
विशाल श्रम शक्ति के बावजूद कौशल बेमेल और कुशल भारतीय प्रवासी श्रमिकों की कमी का मुद्दा अतीत में अक्सर उजागर किया गया है। संपूर्ण कौशल अनुकूल नौकरियों के संबंध में कई भारतीय फर्मों ने अतीत में इस मामले को उठाया है। इस लेख में, हम भारतीय प्रवासी श्रमिकों के कौशल बेमेल के मुद्दे पर थोड़ा गहराई से विचार करेंगे, क्योंकि यह हमारे घरेलू राजस्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

| कंटेंट टेबल |
| भारतीय प्रवासी श्रमिकों की स्थिति और महत्व क्या है? विदेशों में भारतीय प्रवासी कामगारों की संख्या में वृद्धि के पीछे क्या कारण हैं? भारतीय प्रवासी श्रमिकों का महत्व क्या है? भारतीय प्रवासी श्रमिकों के साथ कौशल संबंधी चुनौतियाँ क्या हैं? भारतीय प्रवासी श्रमिकों के लिए सरकार द्वारा कौन सी कौशल पहल की गई हैं? आगे का रास्ता क्या होना चाहिए? |
भारतीय प्रवासी श्रमिकों की स्थिति और महत्व क्या है?
विदेशों में भारतीय प्रवासियों की स्थिति और डेटा (Status and Data on Indian Migrants abroad) – विदेशों में लगभग 30 मिलियन भारतीय रहते हैं। उनमें से एक बड़ा हिस्सा खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों (9 मिलियन भारतीय प्रवासी) और दक्षिण पूर्व एशिया में रोजगार हेतु रहते हैं। मुख्य रूप से निम्न और अर्ध-कुशल श्रमिक GCC क्षेत्र में 90% से अधिक भारतीय प्रवासी श्रमिकों का निवास है।
रोजगार का क्षेत्र (Sector of Employment)- भारतीय प्रवासी श्रमिक आमतौर पर निर्माण, घरेलू कार्य और विभिन्न सेवा उद्योगों जैसे क्षेत्रों में भूमिका निभाते हैं। कई अस्थायी प्रवासी हैं जो अपने अनुबंध के पूरा होने पर भारत लौट आते हैं।
प्रेषण (Remittances)- विश्व बैंक के अनुसार, 2023 में, भारतीय प्रवासी श्रमिकों द्वारा घर वापस भेजा गया प्रेषण 125 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। ये प्रेषण विदेशी कार्यबल के महत्वपूर्ण वित्तीय योगदान को उजागर करते हैं, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 3.4% है। विश्व बैंक के अनुसार, भारत प्रेषण का दुनिया का अग्रणी प्राप्तकर्ता है, इसके बाद मेक्सिको और चीन हैं।
विदेशों में भारतीय प्रवासी श्रमिकों में वृद्धि के पीछे क्या कारण हैं?
- जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Shifts)- भारत में एक बड़ी और बढ़ती कामकाजी उम्र की आबादी है, जिसमें कई युवा रोजगार के अवसरों की तलाश में हैं। यह जनसांख्यिकीय लाभांश अन्य देशों में श्रम की कमी को पूरा करने के लिए संभावित प्रवासी श्रमिकों का एक महत्वपूर्ण पूल बनाता है। उदाहरण के लिए- इजरायल फिलिस्तीन युद्ध के कारण इजरायल में श्रम की कमी।
- कौशल की कमी (Skill Shortages)- गंतव्य देशों को अक्सर कुछ व्यवसायों में कौशल की कमी का सामना करना पड़ता है और इन अंतरालों को भरने के लिए भारत से प्रवासी श्रमिकों की ओर रुख करते हैं। भारतीय प्रवासी वैश्विक श्रम बाजार की मांगों को पूरा करने के लिए कौशल और विशेषज्ञता की एक श्रृंखला लाते हैं। उदाहरण के लिए- भारत में कुशल निर्माण श्रमिकों की कमी।
- लागत लाभ (Cost Advantages)- गंतव्य देशों में स्थानीय श्रमिकों की तुलना में भारतीय प्रवासी श्रमिकों को काम पर रखना कभी-कभी नियोक्ताओं के लिए अधिक लागत प्रभावी होता है। वेतन अंतर भारत से श्रमिकों की भर्ती के लिए एक प्रोत्साहन है। उदाहरण के लिए- न्यूनतम मजदूरी की आवश्यकता के बिना भारतीयों को सॉफ्टवेयर नौकरियां।
- वैश्वीकरण और गतिशीलता (Globalization and Mobility)- वैश्वीकरण और गतिशीलता में वृद्धि ने श्रमिकों के लिए बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में सीमाओं के पार पलायन करना आसान बना दिया है। उदाहरण के लिए- भारत और खाड़ी देशों के बीच बेहतर उड़ान कनेक्टिविटी।
- श्रम क्षेत्र में बढ़ी मांग (Increased demand in labour sector)- राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (NSDC) द्वारा तैयार ग्लोबल स्किल गैप रिपोर्ट में 2020 में GCC देशों (खाड़ी सहयोग परिषद) और यूरोपीय संघ में निर्माण, व्यापार, स्वास्थ्य और सामाजिक देखभाल जैसे प्रमुख क्षेत्रों में श्रम की मांग का अनुमान लगाया गया है। पश्चिमी दुनिया के कुछ देश अब श्रमिकों की कमी को पूरा करने के लिए अस्थायी कार्य अनुबंधों की वकालत कर रहे हैं।
भारतीय प्रवासी श्रमिकों का महत्व क्या है?
- आर्थिक योगदान (Economic Contribution–)- विदेशों में भारतीयों द्वारा भेजा गया धन भारत की GDP का लगभग ~3% है।
- कौशल विकास (Skill Development)- विभिन्न देशों में प्रवास करने से भारतीय श्रमिकों को नए कौशल हासिल करने और अनुभव प्राप्त करने में मदद मिलती है। जब वे भारत लौटेंगे तो मूल्यवान ज्ञान और विशेषज्ञता को वापस ला सकते हैं जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को मदद मिल सकती है।
- भारत की सॉफ्ट पावर में वृद्धि (Enhancement of India’s Soft Power)- विदेशों में एक बड़े भारतीय प्रवासी की उपस्थिति, भारत और इन देशों के बीच राजनयिक और व्यापार संबंधों को मजबूत करती है। प्रवासी भारत और अन्य देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, निवेश और व्यापार साझेदारी के लिए एक पुल के रूप में कार्य करते हैं।
भारतीय प्रवासी श्रमिकों के साथ कौशल संबंधी चुनौतियाँ क्या हैं?
- शिक्षा-व्यवसाय बेमेल (Education-Occupation Mismatch)- प्रवासी श्रमिकों के शिक्षा स्तर और उपलब्ध नौकरियों की कौशल आवश्यकताओं के बीच भारी विसंगति मौजूद है। उदाहरण के लिए- श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार, 15-59 वर्ष की आयु वर्ग के केवल एक छोटे वर्ग को ही औपचारिक व्यावसायिक/तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त हुआ है।
- श्रम बाजार की गतिशीलता (Labour Market Dynamics)- उच्च मांग की अवधि में, नियोक्ता यह सुनिश्चित करने के बजाय कि उम्मीदवार कौशल आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, पदों को जल्दी से भरने को प्राथमिकता देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि कार्यबल अपनी भूमिकाओं के लिए पर्याप्त रूप से योग्य नहीं होता है।
- शिक्षा की गुणवत्ता (Quality of Education)- भारत में शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की गुणवत्ता हमेशा बाजार की जरूरतों के अनुरूप नहीं होती है। कई शैक्षणिक संस्थान व्यावहारिक कौशल के बजाय सैद्धांतिक ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- भौगोलिक और क्षेत्रीय बेमेल (Geographic and Sectoral Mismatch)- भारतीय प्रवासी श्रमिकों को अक्सर भौगोलिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है जो उन्हें अपने कौशल से मेल रखने वाली नौकरियों तक पहुंचने से रोकते हैं। इसके अलावा, अर्थव्यवस्था में क्षेत्रीय बदलाव कार्यबल के कौशल और उभरते उद्योगों की जरूरतों के बीच एक बेमेल की ओर जाता है।
- अनौपचारिक रोजगार क्षेत्र (Informal Employment Sector)– प्रवासी श्रमिकों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है, जहां नौकरी की आवश्यकताएं अक्सर उनके कौशल से मेल नहीं खाती हैं। इस क्षेत्र में अक्सर उचित नौकरी और योग्यता का अभाव होता है, जिससे श्रमिकों के लिए उनकी विशेषज्ञता के अनुरूप पदों को ढूंढना मुश्किल हो जाता है।
भारतीय प्रवासी श्रमिकों के लिए सरकार द्वारा की गई कौशल पहल क्या है?
| प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) | PMKVY के तहत, प्रवासी श्रमिक अपनी रोजगार क्षमता बढ़ाने और बेहतर मजदूरी अर्जित करने के लिए कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों का उपयोग कर सकते हैं। |
| प्रवासी श्रमिकों की स्किल मैपिंग | कई राज्य सरकारों ने प्रवासी श्रमिकों के कौशल और दक्षताओं का आकलन करने के लिए कौशल मानचित्रण अभ्यास शुरू किया है। उदाहरण के लिए- मध्य प्रदेश |
| प्रवासी कौशल विकास योजना (PKVY) | यह विदेश मंत्रालय और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय की एक संयुक्त पहल है, जो श्रमिकों को अंतर्राष्ट्रीय एकीकरण के लिए सांस्कृतिक कौशल युक्त बनाती है। |
आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?
- समग्र कौशल (Holistic skilling)- राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (NSDC) को संपूर्ण कौशल पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसमें तकनीकी और प्रशिक्षण संस्थान, प्रशिक्षक और कौशल पाठ्यक्रम शामिल होना चाहिए।
- श्रीलंकाई मॉडल का अनुकरण करना (Emulating the Sri Lankan Model)- भारत को यह सुनिश्चित करने के श्रीलंकाई दृष्टिकोण का अनुकरण करने का लक्ष्य रखना चाहिए कि श्रमिकों को उनके प्रस्थान से पहले कुछ सप्ताह का अतिरिक्त प्रशिक्षण प्राप्त हो, और वे अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं और कार्य प्रथाओं से अवगत हों।
- पूर्व-कुशल उम्मीदवारों की पहचान (Identification of Pre-Skilled Candidates)- हमारा लक्ष्य मानकीकृत परीक्षणों और प्रमाणपत्रों के माध्यम से संभावित प्रवासियों के मौजूदा कौशल का आकलन करना होना चाहिए। यह विशिष्ट कौशल अंतराल पर केंद्रित लक्षित प्रशिक्षण कार्यक्रमों को सक्षम करेगा।
- अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ फिनिशिंग स्कूल (Finishing Schools with International Standards)- अंतरराष्ट्रीय उद्योग की जरूरतों के अनुरूप मानकों का पालन करते हुए राज्यों में स्किलयुक्त विद्यालय स्थापित करने की आवश्यकता है। प्रौद्योगिकी उन्नयन को शामिल करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग्य प्रशिक्षकों को शामिल करने से इन स्कूलों की प्रभावशीलता सुनिश्चित होगी।
- भाषा प्रशिक्षण (Language Training)- कौशल मॉडल में भाषा प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल होने चाहिए जो बुनियादी संवादी कौशल से परे हों, व्यावसायिक संचार और उद्योग-विशिष्ट शब्दावली पर ध्यान केंद्रित करें।
- वित्तीय साक्षरता (Financial Literacy)- वित्तीय साक्षरता कार्यक्रमों के समावेश से कौशल मॉडल और मजबूत होगा। श्रमिकों को वित्तीय प्रबंधन कौशल से लैस करने से उन्हें विदेशी रोजगार के लाभों को अधिकतम करने और बुद्धिमान वित्तीय निर्णय लेने में सशक्त बनाया जाएगा।
काम का भविष्य निरंतर सीखने और अनुकूलन क्षमता की मांग करता है। एक पूर्ण कौशल मॉडल अधिक प्रतिस्पर्धी और विश्व स्तर पर प्रासंगिक भारतीय कार्यबल के लिए मार्ग प्रशस्त कर सकता है, जिससे प्रेषण में वृद्धि, राष्ट्रीय और राज्य स्तरों पर आर्थिक विकास और एक मजबूत वैश्विक उपस्थिति हो सकती है।
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